वो के मेरे नींद की परतों में उतर आ जाया करता और सुबह होने से पहले मुझे सुला जाया करता।
एक दो रोज़ से दिल खफ़ा खफ़ा सा है,
हफ्ते भर की रोशनी से नहाया चांद जैसे दग़ा दग़ा सा है।
मुझको मुझसे तौलिये हुज़ूर ,महफ़िल में बुलाकर बोलिये।
ना औरों की बातों से इस दिल को यूं कुरेदीये।
जो बोलते है तल्ख-ए-मिज़ाज़ के किस्से मेरे चेहरे के ,उनके गिरेबान में भी झांक कर कुछ देखिए।
ग़म हैं हमे आपकी बेवफाई का
के जी हुज़ूर कर के , औरों के दर पर ना छोड़िए।
मन है खुली किताब साब पन्ने पलट ना दीजिये,जब तक आपके साथ है कुछ प्यार से ही बोलिये।।
©कविता वर्मा
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