धुँआ धुँआ सा दिखता है
दिल से जो ये रिसता है
कहीं दूर किसी सूखे दरख़्त के गिरते पत्ते सा
मेरा दिल खफ़ा खफ़ा सा है,
बेरुखी ज़िन्दगी को देखकर ये बेवफा सा है।
अब जो टुकड़े टुकड़े से है मेरे,
समेट लूं उनको अगर,
बिखरी बिखरी शख्सियत सी हैं मेरी,
मगर ये दिल भरा भरा सा है ।
टूटकर कभी यूँ न गिरी थी भरे बाज़ार,
अभी जो गिर गयी हूं,
ये दिल सबसे उठा उठा सा है।
रात नसीब होती है,सुबह के इंतज़ार में,
अंधेरे में ये दिल अब डरा डरा सा है ।
तुम ना समझोगे इसकी दवा-ए-मर्ज,
एक रोज़ पूछो हालचाल,
मेरा दिल मरा मरा सा है।
बुझ गए है चिराग शमा को रौशन करके,
शमा से ये दिल अब बुझा बुझा सा है।
©कविता वर्मा
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