शनिवार, 27 जून 2020

हम -तुम
फिर लिख रही हूँ चांद कागज़ पर।
सुना है कविता लिखनी छोड़ दी है मैंने।
कुछ शब्द तारों से बुने है अभी।
रात की कविता।
आओ!
आज लिखते है चाँद ओढ़कर सुकून से।
हम -तुम ,बहुत दिन हो गए है।
सूरज को ताके,
मोगरे को सूंघे।
चलो कुछ फूल कागज़ पर बिखेर दो।
कुछ सावन मन में बरसने दो,
क्या पता!
उग आएगा सतरंगी इंद्रधनुष मुझ में।
सात रंगों से  सजी कविता !
आओ हम-तुम फिर से लिखते है।
पान सी कुछ मीठी ,
कुछ कथ्थे सी खारी,
सारा गुलकंद नही तो थोड़ा ही सही।
बाकी ढेर सारा सुकून।
आओ लिखते है हम तुम।
©कविता वर्मा

बुधवार, 24 जून 2020

खाली पन्ना

खाली पन्ना।

इस बार भी ना रिता सकी मन।
कुछ बोझ भर सा है।
जो उठता नही मन से ,
और गिरता नही देह से।
स्वछन्द सोच।।
हाँ नही मिलते ऐसे अक्षर,
जो खोल सके मन की परतें।
हर बार सोचती हूं रंग भर दूँ अक्षरों के,
कोरी कल्पना और शब्दों के केनवास पर।

और मिला दूँ उस बोझ को ,
इन हलके वर्णो से ।
बन जायेंगे गीत से।
पर रह जाता हैं हर बार यही सब ,
और फड़फड़ाता है "
मन का खली पन्ना"।।

शब्दों को चुनना,
शिकायत सी होगी।
सोच से कलम रूठ जाएगी।
अनगिनत ,असीम,उलझे विचार ख्याल,
लिखना चाहा है, इसे कई बार।
कलम सीधी करके ,
साथ नही दे पाती ये ,
शब्द नही दे पाती ये,
उन उफनते विचारो को।
सच दे!सामाजिक स्याही और विद्रोही विचार।
और वक़्त भी नही रुकता ,
सोच के साथ,मुह फेर के आगे बढ़ता है।
खाली पन्ने सा फड़फड़ाता है।
©कविता वर्मा

काठ

काठ का मन
काठ का तन
काठ सा जीवन
काठ सी बेजान ख्वाहिशें ।
टक-टक ठुकती कींल
एक एक चाहत में।
काठ की हसरतें,
संवेदना शून्य ,काठ सी।
जमती,गलती सपनों की
फफूँदी से सड़ता ,गलता काठ
सा मन।
विश्वास की धूप को तरसता
काठ,
सीलन में सिसकता काठ ,
निरंतर चल
पर काठ सा स्थिर।
©Kavita Verma

बुधवार, 17 जून 2020

सुशांत,देश और सरहद।

बीमारी,मौतें,सरहद  और सिस्टम से हरी हुई आत्महत्या। विफल देश तंत्र और सरकारी हाल।
मुद्दा चाहे देश व्यापी हो या व्यकितगत , आजकल हर जगह एक आम उदासी भरी हार दिखती है।
जाने कैसा समय आ गया है।
तुम सोचते हो।
शायद मैं भी।
अगले साल मैं ओर कमाऊंगी या कमाऊँगा।
अगले साल ओर बड़ा घर और बड़ी गाड़ी।
अगले साल?
कोरोना साल।
क्या आपने सोचा था अगला साल ऐसा होगा।
अपने कितने त्याग इस आज को बचाने और संवारने में लगाये थे।
पर क्या अपने इसी साल का निवेश किया था? 
क्या आप खुश है?
हर साल हम अपने वर्तमान की कुछ मुस्कान को  काटकर अगले साल के लिए निवेश कर देते है।
लेकिन ईश्वर और प्रकृति ने मिलकर दिखाया है कि जो हम सोचते है हर बार वेसा होता नही।
हर समस्या हर ओर से जुड़ी हुई है।
इसे देखे।
Quarantine में अकेले रहने का अवसाद पूर्व बीमारी को गहरा गया। 
औऱ हुआ क्या?
देश बीमारी में व्यस्त है।
संसाधन कम है?
तो सीमा में घुसपैठ।
घरों में काम नही है तो लड़ाई ।
जीवन मे उथल पुथल।
एक साथ लंबे समय तक रहने से घर के लोगों में बहस।
क्या हम बचा पाएंगे खुद को।
बीमारी से नही।
अपने आप से।
मानसिक संतुलन से।
क्रमश: .....
©कविता वर्मा

मंगलवार, 16 जून 2020

चाहत

कुछ रेशमी रंग और मखमली शब्द दे दो।
कविता जी उठेगी।
साकार होकर निराकार से,
फिर चल पड़ेगी।
तुम छू कर देखो,
मुझे कुछ
रूहानी स्पर्श दे दो।
केनवास पर बन जाएगी ,
कुछ अनदेखी रेखाएं,
खींच सकेगी मेरी तसवीर,
ऐसी कूची-कलम दे दो।।
बाकी रंग हज़ार ,
और मौसम बहार।
आने दो इन्हें,मुझे एक रास्ता दे दो।।
©कविता वर्मा

मैं।

मौन हूँ ,
निशब्द हूँ,
स्वरचित हूँ,
नगण्य हूँ,
शब्द बन्ध नही,
कल्पना से उपजी चेतना,
मैं  सजग कविता हूँ ।।।
©कविता वर्मा

मेरा सफर

मैं गुज़र रही हूँ
आजकल मुझमे से,
होकर तेरे रास्ते।।
जो कदम लड़खड़ा गए,
रोक लेना कुछ देर और तेरे रास्ते।
दरमियाँ ना शिकस्त है,
इस कदर मिल गए है साये,
जैसे गुज़रा बूढा दिन हो और जवान होती रात।
पहचान लेना इस बीच मुझे मेरे लिबास से,
कुछ दर्द कुछ गम को लपेट रखा है।
तेरे ही दरवाजे पे गिराए है कुछ लाल आँसू।
रोशनी भर के नगीना महफूज़ रख लेना,
एक आंसू ही सही तू भी थोड़ा रो लेना।।
बाकी जो मैं रहूं थोड़ा और रोक लेना।
ज़िन्दगी ना सही एक वक्त और झेल लेना।
©कविता वर्मा

कितना नज़दीक था वो

वो के मेरे नींद की परतों में उतर आ जाया करता और सुबह होने से पहले मुझे सुला जाया करता।
एक दो रोज़ से दिल खफ़ा खफ़ा सा है,
हफ्ते भर की रोशनी से नहाया चांद जैसे दग़ा दग़ा सा है।
मुझको मुझसे तौलिये हुज़ूर ,महफ़िल में बुलाकर बोलिये।
ना औरों की बातों से इस दिल को यूं कुरेदीये।
जो बोलते है तल्ख-ए-मिज़ाज़ के किस्से मेरे चेहरे के ,उनके गिरेबान में भी झांक कर कुछ देखिए।
ग़म हैं हमे आपकी बेवफाई का
के जी हुज़ूर कर के , औरों के दर पर ना छोड़िए।
मन है खुली किताब साब पन्ने पलट ना दीजिये,जब तक आपके साथ है कुछ प्यार से ही बोलिये।।
©कविता वर्मा

धुंआ धुंआ सा

धुँआ धुँआ सा दिखता है
दिल से जो ये रिसता है
कहीं दूर किसी सूखे दरख़्त के गिरते पत्ते सा
मेरा दिल खफ़ा खफ़ा सा है,
बेरुखी ज़िन्दगी को देखकर ये बेवफा सा है।
अब जो टुकड़े टुकड़े से है मेरे,
समेट लूं उनको अगर,
बिखरी बिखरी शख्सियत सी हैं मेरी,
मगर ये दिल भरा भरा सा है ।
टूटकर कभी यूँ न गिरी थी भरे बाज़ार,
अभी जो गिर गयी हूं,
ये दिल सबसे उठा उठा  सा है।
रात नसीब होती है,सुबह के इंतज़ार में,
अंधेरे में ये दिल अब डरा डरा सा है ।
तुम ना समझोगे इसकी दवा-ए-मर्ज,
एक रोज़ पूछो हालचाल,
मेरा दिल मरा मरा सा है।
बुझ गए है चिराग शमा को रौशन करके,
शमा से ये दिल अब बुझा बुझा सा है।
©कविता वर्मा

तुम जो

तुम जो...
थोड़े से मिलते हो,
उसमे भी बहुत सारा इंतज़ार।
बातें दो चार,
बाकी प्रेम के रंग हज़ार।
मैं धीरज नही धर सकती ,जानते हो।
तुम कविता नही समझ सकते ,जानती हूँ,
थोड़ा सा तुझे मैं धर लूं,
थोड़ा सा तू मुझे पढ़ ले।
इस तरह से ये बस मन की बात कर लें। 
©kavita verma

बुधवार, 10 जून 2020

एक मौन

एक मौन आंखों में धरा हैं।
एक इंतज़ार जुबान पर रखा है।
हज़ार रंग मन मे घुले है ।
और एक अधूरा संवाद ,
तेरे ओर मेरे 
दरमियां;
पसरा है ,
सदियों से,
तो ,आओ!
चख ले शब्दों के जायके 
और तोड़ दे बेस्वाद चुप्पी की दीवार।
ज़रा से आखर और एक मौन स्वीकृति,
काफी होगी पूरा करने में,
अधूरा संवाद।
©कविता वर्मा

शनिवार, 6 जून 2020

close



Only myself ..
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------------
far away from all worldly chores
beyond all fair fairy tales.
I m on the shore of reality.
The waves are signing towards
the ending point.
But i am not here to put an end
to my breathes.
All the heroes of valour tales,
can't wean my way from me.
I carried myself away from
tempts.
For they say ,have control over
five doors of knowledge
i am not deity or saint.
That's can't be my path
to walk without colours or
words.
So i am here in my colours n
words.
With all my fairy to wild
imagination .
I set pace with time
I set pace with time
to taste more ,
to see more.
To tell more
to express more
i shall live here.
So i am here
with this sea
to take some patience
and to learn how to go forth
with bitterness.
And finally to learn
how to attract rivers of
relations.
Close to myself again.
©kavita verma
~kv~
7:35am
23sept.

lost figure

Lost Figure
************
she ,standing with her aching heart.
Facing the old mirror ,
in the darkest room .
she may be trying to trace out herself .
Her lost life in an old mirror in the dark room.
Her phases of life has been clay,shaped by others ,
her body has been guarded by others.
She is shaped and played n ruled by others .
A miserable live puppet .
On others signs she breathes in and out.
Dances at strange tunes .
Would she ever achieve her own status.
Yesterday at 9:37am·
©kavita verma

soul in the air

Soul in the rain.
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Could you please , tell 
what is going on here ,
i dont know honey.
Because i am always in a dream 
and it's almost more than a daze,
and never wear doubts and tensions .
This is the soul that wonders 'nacked' everywhere, corners and nooks.
I get the things and  throw it over 
because i am hinding a wild heart 
and ohh ! You see ,i always get to be the same.
Always beat the things up 
and set up a journey to a new land .
No i am not that lass called Alice .
You know it always not like the milkyway.
I mellow up and sneak the secrets ,
Though you look up your hearts .
My mind sketch some dirty figures and i disfigure them .
Don't you know , i hate you more 
when i don't know why.
These ways are not always to be explained .
So i screw all these up, 
please don't let me down 
this courage is high temperate, 
i get to chill but will you please shut up
my head ,carrying frigging things, and these tangled braids frustrates me.
I be in that bed always alone and think myself a witch.
But i'll not let you call my names
i am not in cage this time.
And can't help if i always be like the same.
I walk under heavy rain .
So please i don't need these old shelters.
©kavita verma

the love💛💚💙💜💟

The love
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How these things can work into my mind ,
i have never felt this word
how different things go mingle
and art one,
is this magic,trust or contribution
sometimes i stand alone in sounds
with my eyes closed
and i let it go out .
But i can not intake it .
This is an unnamed feeling.
But when i see it comes to my heart and changes the core,
makes me laugh and a stong belief
centuries have passed together,
detonations and names
but this cimplex thing is unrevealed.
©Kavita verma

शुक्रवार, 5 जून 2020

a girl

A Girl
******
******
******
i found a girl  ,
who lost his weapons and power to think.
I saw her swirl
in puddle of bubble ,with silly ideas.
she never knew her ways n might.

I found a girl who scuffed with
her times...
And odd and even  
her eyes got frozen gems..
You might have never seen such stupid .
............
Then one day...
A guide was there to led her.....
A light was there to direct her..
In open field ...under hazy stars 
she found a light.
Twinkling 'tws with weak light.
Though she believed it.
Under the gazebo she tried to measure the world.
She came out to be a part .
To see.
To judge.
How incredible,
how amazing it could be.
The world around her was crawling .
By Silly little things .
She found her guide.
'kv'
©Kavita verma

होली के गीत

होली के गीत
<*-----------*>
बसंत की पगडन्डियों से चलकर,
फूलो के रंगों से सजकर,
भोर के गालो पर गुलाल मलने
उषा को और सिंदुरी करने,
भौंरा बन फूलो के गाल सहलाने,
वृंदावन की गलियो में धूम मचाने,
कान्हा-औ-गोपियों संग रास रचाने ,

सरसों कों पीली चुनरी ओढाने,
लाल-गुलाबी ओढनी रंगने,
मलय सी हवाओ को और महकाने,
वेणी मे अपनी गुलाब गूँथवाने,

गाँव मे,बागों में,खेतों में,दरख्तों में,
हर गली ,कूचे मेरंग महकाने,
हर अटारी, हर छज्जे, हर खिड़की ,दरवाजे को खुलवाने !
सुन री सखी ,फाल्गुन आ गया है!!!
©कविता वर्मा

Those eyes

THO$€ €¥€$
*************
Of all those sweet pleasures 
that moved into my soul,
Was blessing of those eyes.
The  pair of eyes ,
that were sharp  ,direct and skill at archery .
With slow steps walked into my heart.
I behaved myself  after my introduction with those eyes.
Before it my heart was so tried and empty like cistern.
It was only longing for an oasis.
But when the eyes came,
my life was full of salty water .
my head was empty, feeling itself with void and silence.
My ears were echoing with reverberating of horrible sounds.
The cave of my mouth was black n dark  the coiled snake were killing my enthusiasm.
This skull was numb.
But when i saw those eyes  ,the tide n waves energy too came into it .
Those eyes were ocean of pleasure to me.
And Every day  i dived into it to find the pearls of love .
To touch the horizon to be united with earth n sky.
Those eyes were flowing towards the bay of my soul.
Those eyes are heaven.
~Kv~
©Kavita verma

गुरुवार, 4 जून 2020

नया आयाम

नया आयाम
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बागी हूँ ! रीति और रिवाज़ो से,
बंध,छंद की मुड़ी-तुड़ी प्रथाँए ,
कहाँ बाँधें ;
देखा है तुमनें उड़ती हवा के पर ,
खुली खिड़की की निश्चल कल्पनाँए ।
खोल दिया आज किवाड़ पुराना ,
दृष्टिकोण , सुखद ,सम्पूर्ण !
अडिग ,सुँदर है नये कदम ।
नया विश्वास सजाया आज ,
फेंक पुरानी ओढनी, संस्कृति की नयी अगुवाई ।
बागी ! हूँ समाज से
रीति और रिवाज से।
रंग घोल दूँ ,आज नये हवा मे अपने हिसाब से ।
मोड़ दूँ हर लहर ,
कश्ती रगींन ख्बाव की
बागी!  बँधे मेहराब की ।
ओढी चुनरी सुखद अहसास की ! 
कुचल  आज पुरानी पतवारों को,
तैरना है  उफनते मझधार में।
 ~kv~
©Kavitaverma

अधूरा समीकरण

अधूरा समीकरण

एक किनारे प्रेम धरा। 
एक किनारे वक्त।
दोनों समीकरण अधूरे थे,
मुझे गणित नही आया।
तुझे प्रेम नही आया।
बेबस रिसता रहा लाचार प्रेम,
समय की छलनी से,
मैं रफू करती रही ,
प्रेम की चादर को।
दरारें बढ़ती गयी ,
उस इमारत की।
तुझे प्रेम ओढ़ना न आया 
मुझे प्रेम सीना न आया।
एक किनारे धरा रहा अधूरा समीकरण।।
©कविता वर्मा


बुधवार, 3 जून 2020

निर्माण

कुछ रेशमी रंग और मखमली शब्द दे दो।
कविता जी उठेगी।
साकार होकर निराकार से,
फिर चल पड़ेगी।
तुम छू कर देखो,
मुझे कुछ
रूहानी स्पर्श दे दो।
केनवास पर बन जाएगी ,
कुछ अनदेखी रेखाएं,
खींच सकेगी मेरी तसवीर,
ऐसी कूची-कलम दे दो।।
बाकी रंग हज़ार ,
और मौसम बहार।
आने दो इन्हें,मुझे एक रास्ता दे दो।।
©कविता वर्मा 

सफर अपने तक

मैं गुज़र रही हूँ
आजकल मुझमे से,
होकर तेरे रास्ते।।
जो कदम लड़खड़ा गए,
रोक लेना कुछ देर और तेरे रास्ते।
दरमियाँ ना शिकस्त है,
इस कदर मिल गए है साये,
जैसे गुज़रा बूढा दिन हो और जवान होती रात।
पहचान लेना इस बीच मुझे मेरे लिबास से,
कुछ दर्द कुछ गम को लपेट रखा है।
तेरे ही दरवाजे पे गिराए है कुछ लाल आँसू।
रोशनी भर के नगीना महफूज़ रख लेना,
एक आंसू ही सही तू भी थोड़ा रो लेना।।
बाकी जो मैं रहूं थोड़ा और रोक लेना।
ज़िन्दगी ना सही एक वक्त और झेल लेना।
©कविता वर्मा

कितना नज़दीक था वो

वो के मेरे नींद की परतों में उतर आ जाया करता और सुबह होने से पहले मुझे सुला जाया करता।
एक दो रोज़ से दिल खफ़ा खफ़ा सा है,
हफ्ते भर की रोशनी से नहाया चांद जैसे दग़ा दग़ा सा है।
मुझको मुझसे तौलिये हुज़ूर ,महफ़िल में बुलाकर बोलिये।
ना औरों की बातों से इस दिल को यूं कुरेदीये।
जो बोलते है तल्ख-ए-मिज़ाज़ के किस्से मेरे चेहरे के ,उनके गिरेबान में भी झांक कर कुछ देखिए।
ग़म हैं हमे आपकी बेवफाई का
के जी हुज़ूर कर के , औरों के दर पर ना छोड़िए।
मन है खुली किताब साब पन्ने पलट ना दीजिये,जब तक आपके साथ है कु
छ प्यार से ही बोलिये।।
©कविता वर्मा

ये दिल

धुँआ धुँआ सा दिखता है
दिल से जो ये रिसता है
कहीं दूर किसी सूखे दरख़्त के गिरते पत्ते सा
मेरा दिल खफ़ा खफ़ा सा है,
बेरुखी ज़िन्दगी को देखकर ये बेवफा सा है।
अब जो टुकड़े टुकड़े से है मेरे,
समेट लूं उनको अगर,
बिखरी बिखरी शख्सियत सी हैं मेरी,
मगर ये दिल भरा भरा सा है ।
टूटकर कभी यूँ न गिरी थी भरे बाज़ार,
अभी जो गिर गयी हूं,
ये दिल सबसे उठा उठा  सा है।
रात नसीब होती है,सुबह के इंतज़ार में,
अंधेरे में ये दिल अब डरा डरा सा है ।
तुम ना समझोगे इसकी दवा-ए-मर्ज,
एक रोज़ पूछो हालचाल,
मेरा दिल मरा मरा सा है।
बुझ गए है चिराग शमा को रौशन करके,
शमा से ये दिल अब बुझा बुझा सा है।
©कविता वर्मा

एकांत में पलाश

एकांत में पलाश 


तुमने देखा है ना,
आजकल वो पलाश कुछ उदास सा है।
अकेला खड़ा धूप में,
पीले फूलों से लदा ,तुमने देखा ना।
नही झर रहे उसके उदास फूल।
नही देख रहा राह किसी राहगीर की।
नुक्कड  सुनसान है,
और उसे पता है नही आओगे तुम।
पीले फूल चुनने ।
किसी गजरे को नही सजाओगे।
अब नही महकेंगे हाथ मेरे,
स्पर्श से तुम्हारे।
इसलिए इंतज़ार बरस रहा है, फूलों से 
और वक़्त बेबस है ,फिसलने को।
नही जलाएगा कोई दीप 
मेरे नाम से ,
सूनी है देहरी ।
लांघना चाहती है खुद ही खुद को।
के आगे कोई सपना अंकुरित हो रहा है,
कोई इंतज़ार बह रहा है,
कोई पलाश फिर सज रहा है।
कुछ फूल फिर खिल रहे है ,
वो देखो तुम तो आ ही गए।
मेरा पलाश लेकर।
©kavita verma

पलायन

  • पलायन 



प्रत्येक संभावनाओं में,
कृष्ण-कृष्णा का सा संतुलन 
सबसे स्थिर रखता है समाज को।
तब भी आज भी।
पर अब कृष्ण मिलते नही,
और कृष्णा  जीती नही खुद को  ।
तमाम कालों ओर युगों को देखने के बाद

धृतराष्ट्र सा समय देख रहा है आंखें मूंदे।
चुप्पी के सिंहासन पर।
बेबस है भीष्म का कानून।
दुःशासन सा ढीट राज तंत्र नंगा कर रहा है
देश और काल को ।
कोने में आज की द्रौपदी देख रही है युगों बाद।
नही बदला कुछ भी।
इतिहास के काले उदाहरण के बाद भी।
उधर कृष्ण देख रहे है खाली हाथ ,
नही है अब कोई भी चीर ,
हर युग ,हर काल, हर समाज को ढकने में नाकाम ।
पलायन करते है के
ऐसा समाज नंगा ही ठीक है,
जब तक चीर का निर्माण नही होता।
खुद के द्वारा 
खुद के तंत्र को ढकने के लिए।।
©कविता वर्मा

हम -तुम फिर लिख रही हूँ चांद कागज़ पर। सुना है कविता लिखनी छोड़ दी है मैंने। कुछ शब्द तारों से बुने है अभी। रात की कविता। आओ! आज लिखते है चाँद...