एक किनारे प्रेम धरा।
एक किनारे वक्त।
दोनों समीकरण अधूरे थे,
मुझे गणित नही आया।
तुझे प्रेम नही आया।
बेबस रिसता रहा लाचार प्रेम,
समय की छलनी से,
मैं रफू करती रही ,
प्रेम की चादर को।
दरारें बढ़ती गयी ,
उस इमारत की।
तुझे प्रेम ओढ़ना न आया
मुझे प्रेम सीना न आया।
एक किनारे धरा रहा अधूरा समीकरण।।
©कविता वर्मा

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