मुद्दा चाहे देश व्यापी हो या व्यकितगत , आजकल हर जगह एक आम उदासी भरी हार दिखती है।
जाने कैसा समय आ गया है।
तुम सोचते हो।
शायद मैं भी।
अगले साल मैं ओर कमाऊंगी या कमाऊँगा।
अगले साल ओर बड़ा घर और बड़ी गाड़ी।
अगले साल?
कोरोना साल।
क्या आपने सोचा था अगला साल ऐसा होगा।
अपने कितने त्याग इस आज को बचाने और संवारने में लगाये थे।
पर क्या अपने इसी साल का निवेश किया था?
क्या आप खुश है?
हर साल हम अपने वर्तमान की कुछ मुस्कान को काटकर अगले साल के लिए निवेश कर देते है।
लेकिन ईश्वर और प्रकृति ने मिलकर दिखाया है कि जो हम सोचते है हर बार वेसा होता नही।
हर समस्या हर ओर से जुड़ी हुई है।
इसे देखे।
Quarantine में अकेले रहने का अवसाद पूर्व बीमारी को गहरा गया।
औऱ हुआ क्या?
देश बीमारी में व्यस्त है।
संसाधन कम है?
तो सीमा में घुसपैठ।
घरों में काम नही है तो लड़ाई ।
जीवन मे उथल पुथल।
एक साथ लंबे समय तक रहने से घर के लोगों में बहस।
क्या हम बचा पाएंगे खुद को।
बीमारी से नही।
अपने आप से।
मानसिक संतुलन से।
क्रमश: .....
©कविता वर्मा
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