हम -तुम
फिर लिख रही हूँ चांद कागज़ पर।
सुना है कविता लिखनी छोड़ दी है मैंने।
कुछ शब्द तारों से बुने है अभी।
रात की कविता।
आओ!
आज लिखते है चाँद ओढ़कर सुकून से।
हम -तुम ,बहुत दिन हो गए है।
सूरज को ताके,
मोगरे को सूंघे।
चलो कुछ फूल कागज़ पर बिखेर दो।
कुछ सावन मन में बरसने दो,
क्या पता!
उग आएगा सतरंगी इंद्रधनुष मुझ में।
सात रंगों से सजी कविता !
आओ हम-तुम फिर से लिखते है।
पान सी कुछ मीठी ,
कुछ कथ्थे सी खारी,
सारा गुलकंद नही तो थोड़ा ही सही।
बाकी ढेर सारा सुकून।
आओ लिखते है हम तुम।
©कविता वर्मा
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