बुधवार, 3 जून 2020

सफर अपने तक

मैं गुज़र रही हूँ
आजकल मुझमे से,
होकर तेरे रास्ते।।
जो कदम लड़खड़ा गए,
रोक लेना कुछ देर और तेरे रास्ते।
दरमियाँ ना शिकस्त है,
इस कदर मिल गए है साये,
जैसे गुज़रा बूढा दिन हो और जवान होती रात।
पहचान लेना इस बीच मुझे मेरे लिबास से,
कुछ दर्द कुछ गम को लपेट रखा है।
तेरे ही दरवाजे पे गिराए है कुछ लाल आँसू।
रोशनी भर के नगीना महफूज़ रख लेना,
एक आंसू ही सही तू भी थोड़ा रो लेना।।
बाकी जो मैं रहूं थोड़ा और रोक लेना।
ज़िन्दगी ना सही एक वक्त और झेल लेना।
©कविता वर्मा

कोई टिप्पणी नहीं:

हम -तुम फिर लिख रही हूँ चांद कागज़ पर। सुना है कविता लिखनी छोड़ दी है मैंने। कुछ शब्द तारों से बुने है अभी। रात की कविता। आओ! आज लिखते है चाँद...