प्रत्येक संभावनाओं में,
कृष्ण-कृष्णा का सा संतुलन
सबसे स्थिर रखता है समाज को।
तब भी आज भी।
पर अब कृष्ण मिलते नही,
और कृष्णा जीती नही खुद को ।
तमाम कालों ओर युगों को देखने के बाद
धृतराष्ट्र सा समय देख रहा है आंखें मूंदे।
चुप्पी के सिंहासन पर।
बेबस है भीष्म का कानून।
दुःशासन सा ढीट राज तंत्र नंगा कर रहा है
देश और काल को ।
कोने में आज की द्रौपदी देख रही है युगों बाद।
नही बदला कुछ भी।
इतिहास के काले उदाहरण के बाद भी।
उधर कृष्ण देख रहे है खाली हाथ ,
नही है अब कोई भी चीर ,
हर युग ,हर काल, हर समाज को ढकने में नाकाम ।
पलायन करते है के
ऐसा समाज नंगा ही ठीक है,
जब तक चीर का निर्माण नही होता।
खुद के द्वारा
खुद के तंत्र को ढकने के लिए।।
©कविता वर्मा
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