एकांत में पलाश
तुमने देखा है ना,
आजकल वो पलाश कुछ उदास सा है।
अकेला खड़ा धूप में,
पीले फूलों से लदा ,तुमने देखा ना।
नही झर रहे उसके उदास फूल।
नही देख रहा राह किसी राहगीर की।
नुक्कड सुनसान है,
और उसे पता है नही आओगे तुम।
पीले फूल चुनने ।
किसी गजरे को नही सजाओगे।
अब नही महकेंगे हाथ मेरे,
स्पर्श से तुम्हारे।
इसलिए इंतज़ार बरस रहा है, फूलों से
और वक़्त बेबस है ,फिसलने को।
नही जलाएगा कोई दीप
मेरे नाम से ,
सूनी है देहरी ।
लांघना चाहती है खुद ही खुद को।
के आगे कोई सपना अंकुरित हो रहा है,
कोई इंतज़ार बह रहा है,
कोई पलाश फिर सज रहा है।
कुछ फूल फिर खिल रहे है ,
वो देखो तुम तो आ ही गए।
मेरा पलाश लेकर।
©kavita verma

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