तुम जो...
थोड़े से मिलते हो,
उसमे भी बहुत सारा इंतज़ार।
बातें दो चार,
बाकी प्रेम के रंग हज़ार।
मैं धीरज नही धर सकती ,जानते हो।
तुम कविता नही समझ सकते ,जानती हूँ,
थोड़ा सा तुझे मैं धर लूं,
थोड़ा सा तू मुझे पढ़ ले।
इस तरह से ये बस मन की बात कर लें।
©kavita verma
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें